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तीर्थ यात्रा या पिकनिक

 सच यह है कि आज कई लोगों ने तीर्थ यात्रा को पिकनिक और घूमने जैसा बना दिया है। लेकिन तीर्थ का उद्देश्य कभी भीड़ या मनोरंजन नहीं था, वह भीतर उतरने, खुद से मिलने और शांति पाने का स्थान है।

भारत के किसी भी तीर्थ पर चले जाओ, भीड़ ही भीड़ दिखेगी, लेकिन भीतर की शांति कम ही दिखती है।

केदारनाथ यात्रा


तीर्थ उस व्यक्ति के लिए है, जिसका मन थक चुका हो जो जीवन के अंधेरे में खड़ा हो, सोचकर भी कुछ समझ न पा रहा हो। वह जाता है, बैठता है, और खुद से मिलने की कोशिश करता है।

लेकिन आज हम वहाँ भी वही कर रहे हैं जो रोज़मर्रा में करते हैं तुलना, शिकायत, व्यवस्था पर सवाल, और दिखावा। हाल ही की कुछ यात्राओं में यह भी दिखा कि लोग पहले अनुभव नहीं, बल्कि व्यवस्था को जज करने लगे।

सवाल यह नहीं कि तीर्थ स्थल कैसे हैं, सवाल यह है कि हम वहाँ किस भाव से जा रहे हैं। अगर भीतर शांति नहीं है, तो बाहर का तीर्थ भी शोर ही लगेगा।

आस्था स्थान में नहीं, हमारी अवस्था में होती है। तीर्थ भीड़ के लिए नहीं, भीतर उतरने के लिए होते हैं।

और आप जानते हो कि तीर्थ यात्रा पर किसे जाना चाहिए उसे, जो सच में अपने भीतर के प्रश्नों से जूझ रहा हो; जिसका मन उत्तर खोज रहा हो, न कि सिर्फ दृश्य। जो बाहर नहीं, भीतर की यात्रा करने के लिए तैयार हो।”


जय भोले नाथ!

विचार_राम निवास वर्मा



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