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आजादी या जानवरपंती

आजकल समझ नहीं आता लोगों को क्या हो गया है। किसी भी समाज में, किसी भी नैतिक धर्म में चाहे महिला हो या पुरुष लोगों को एक अजीब तरह की ‘आज़ादी’ पसंद आने लगी है।

ऐसी ज़िंदगी, जहाँ कोई जिम्मेदारी न हो, कोई मर्यादा न हो जैसे *जानवर* जीते हैं। जो मन में आया, वही कर लिया… जहाँ मन किया, चले गए… जो अच्छा लगा, खा लिया… बस अपनी इच्छा ही सब कुछ बन गई।

आज़ादी या जानवरपंती


और आज इसी को लोग ‘freedom’ कहते हैं, ‘modern thinking’ कहते हैं, यहाँ तक कि ‘spirituality’ भी कहने लगे हैं।

पर क्या सच में यही आध्यात्मिकता है?

आध्यात्मिकता का मतलब क्या सिर्फ अपनी इच्छाओं के पीछे भागना है? या फिर अपने अंदर समझ, संतुलन और जिम्मेदारी को जगाना है? 

एक समाज में, एक परिवार में, एक रिश्ते में कुछ सीमाएँ होती हैं पर वो सीमाएँ बंधन नहीं होतीं, वो एक समझ होती हैं…एक संतुलन होता है…जिससे हम एक-दूसरे के साथ रह पाते हैं।

आज लोग उसी संतुलन को ‘बंधन’ कहकर उससे भाग रहे हैं, और खुद को ‘पीड़ित’ मान रहे हैं। पर सच यह है कि शास्त्र, परंपराएँ, नियम ये सब यूँ ही नहीं बने। ये हजारों सालों के अनुभव, सत्य और जीवन की समझ से निकले हुए मार्गदर्शन हैं।

उन्हें ‘कर्मकांड’ या ‘पाखंड’ कहकर छोड़ देना आसान है, लेकिन बिना समझ के उन्हें छोड़ देना हमें धीरे-धीरे इंसान से दूर और सिर्फ इच्छाओं का गुलाम बना देता है।

आज़ादी गलत नहीं है, पर बिना जिम्मेदारी की आज़ादी हमें ऊपर नहीं, नीचे ले जाती है, इंसान होने का मतलब सिर्फ जीना नहीं, बल्कि समझ के साथ, संतुलन के साथ और जिम्मेदारी के साथ जीना है। 


विचार_राम निवास



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