आज इंसान अजीब मोड़ पर खड़ा है। हम एआई से कह रहे हैं “मुझे रियलिस्टिक इमेज दो… रियल जैसा वीडियो बनाओ”
लेकिन
विडंबना देखिए…
जिस दुनिया में हम सांस ले
रहे हैं,
जहाँ हर सुबह सूरज
बिना फ़िल्टर के उगता है,
जहाँ बारिश की बूंदें किसी
एल्गोरिद्म से नहीं गिरतीं,
जहाँ चेहरे पर मुस्कान किसी
प्रॉम्प्ट से नहीं बनती
उसी असली दुनिया को हम नज़रअंदाज़
कर रहे हैं।
हम
प्रकृति के बीच खड़े
होकर भी
उसकी वीडियो नहीं बना रहे,
उसकी कहानी नहीं कह रहे,
उसकी धड़कन नहीं सुन रहे…
लेकिन
स्क्रीन पर बैठकर
“रियलिस्टिक” की मांग कर
रहे हैं।
एआई
से हम असली जैसा
बनवाना चाहते हैं,
पर असली के साथ जीना
नहीं चाहते।
शायद
समस्या एआई नहीं है…
समस्या यह है कि
हमने असली को साधारण समझ
लिया है,
और कृत्रिम को चमत्कार।
सोचिए…
अगर इंसान प्रकृति जितना रियल हो जाए,
तो उसे किसी एआई से रियलिस्टिक मांगने
की जरूरत ही न पड़े।

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